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माँ, ईश्वर का सबसे सुन्दर सिग्नेचरः स्वामी चिदानन्द सरस्वती
May 11, 2020 • SANJEEV SHARMA

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ऋषिकेश, नवल टाइम्सः  परमार्थ निकेतन में आज का दिन माँ, मातृभूमि, मातृभाषा और माता धरती को समर्पित किया। परमार्थ प्रांगण में मातृदिवस के अवसर पर रूद्राक्ष का पौधा रोपित किया। स्वामी जी ने कहा कि माँ, बच्चे को जन्म तो देती है साथ ही पोषण भी करती है। इस प्रकार हम सभी अपनी माँ के साथ मातृभूमि, माता धरती और मातृभाषा से पोषित हुये हंै, इनके अभाव में हम जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते इसलिये माता के लिये एक दिन नहीं बल्कि पूरा जीवन समर्पित हो। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि भारत की संस्कृति में तो हर दिन ही, हर पल ही माँ के लिये है। वह कौन सा पल है, जब माँ समर्पित नहीं होती है। बच्चों के लिये माँ ही उसकी जन्नत होती हैय बच्चे का पूरा संसार होती है।
 
दुनिया का सबसे ताकतवर शब्द है माँ। ’माँ’ केवल एक शब्द नहीं बल्कि अपने आप में पूरा महाकाव्य हैय जीवन का सर्वोत्तम विश्वविद्यालय है। माँ का स्वरूप असीम प्रेम, त्याग, समर्पण, सेवा, सहनशीलता, और अपार श्रद्धा की परिपूर्ण है। माँ के जीवन का आधार ही सहजता, वात्सल्य और प्रेम है। माँ, ममता की मूर्ति है, जिसने माँ को जान लिया उसने मानों पूरे जगत को जान लिया। माँ ही तो बच्चों को असली उड़ान देती है और एक नई पीढ़ी का निर्माण करती।  एक अबोध बालक के लिये माँ ही सम्पूर्ण सृष्टि होती है जहां बालक निर्भय होकर पलता रहता है। वर्तमान समय में क्या हम उसी माता के स्वरूप को भय रहित दुनिया उपलब्ध कराने में सक्षम है?
माँ गंगा सतयुग की गंगा की तरह स्वच्छ और निर्मल प्रवाहित हो रही है। हम चाहे तो लाॅकडाउन के बाद भी हमारी नदियांे को इस तरह स्वच्छ बनाये रख सकते हंै। माँ गंगा, नदियों और पर्यावरण ने यह बात कुछ सप्ताह में ही सिद्ध कर दी है कि जैसे मैं बहती थी वैसे मुझे बहने दो। अविरल, निर्मल हर दम मुझे वैसे ही बहने दो। हमें अपने कल्चर, नेचर और फ्यूचर के संरक्षण पर विशेष ध्यान देना होगा। हमारी संस्कृति और प्राकृतिक सम्पति बचेगी तो ही हमारी संतति बचेगी।
आज के दिन हमें एक और संकल्प लेना होगा वह कि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को हम अपनी मातृभाषा से जोड़े रखेंगे। मातृभाषा और मातृभूमि से जुड़ना मतलब अपनी जड़ों से जुड़े रहना। हमें अपने बच्चों को मातृभाषा से समृद्ध और सम्पन्न बनाना होगा।