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क्या थे चीनी सेना के एलएसी पर पीछे हटने के कारण
July 6, 2020 • SANJEEV SHARMA

पिछले कई दिनों तक एलएसी पर तनाव की स्थिति पैदा करने वाली चीनी सेना ने सोमवार को अपने कदम पीछे खींच लिए। पीछले कुछ हफ्तों से सीमा पर काफी तनाव की स्थिति थी। यहां तक कि 14-15 जून को हुई हिंसक झड़प में हमारे 20 जवान भी शहीद हो गए। चीन की चालबाजियों के बावजूद भारत डटा रहा और लगातार चीन पर दबाव बनाना जारी रखा। अब उसके कदम पीछे होने को भारत की कूटनीतिक जीत माना जा रहा है।  

चीन पर दबाव बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक लद्दाख पहुंचे और उन्होंने जवानों में जोश भरा। सीडीएस जनरल बिपिन रावत समेत तीनों सेनाओं के प्रमुख भी समय-समय पर जवानों का हौसला बढ़ाते रहे। इसके अलावा भारत ने अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बनाने में कामयाबी हासिल की। इसके अलावा लद्दाख का प्रतिकूल मौसम भी चीन की अकड़ तोड़ने में एक अहम हथियार साबित हुआ। 

हम बात करते हैं उन कारणों की जिनकी वजह से चीन को भारत के आगे झुकना पड़ा।

(1) कूटनीतिक प्रयास
भारत और चीन के बीच जब सीमा विवाद शुरू हुआ तो भारत ने इसका समाधान बातचीत के जरिए करने का प्रस्ताव दिया। इसके बाद भारत और चीन के बीच कोर कमांडर स्तर पर बैठकें हुई, लेकिन ये बैठकें बेनतीजा निकलीं।

भारत ने अपनी कूटनीति का प्रयोग करते हुए उन देशों को अपने साथ लिया, जिनसे चीन का तनाव है। चीन पर पहले से ही कोरोना वायरस को लेकर अंतरराष्ट्रीय दबाव था। भारत को सीमा विवाद पर अमेरिका, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों का साथ मिला। इन देशों ने चीन के विस्तारवादी रवैये का खुलकर विरोध किया और भारत को समर्थन दिया। 

इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अचानक लेह के दौरे पर पहुंचे और उन्होंने वहां सेना के जवानों से मुलाकात कर उनका मनोबल बढ़ाया। पीएम मोदी ने थलसेना, वायुसेना और आईटीबीपी के जवानों से मुलाकात की। इस दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौजूदा स्थिति की पूरी जानकारी दी।

पीएम मोदी ने भारतीय जवानों को संबोधित किया और चीन को कड़ा संदेश देते हुए कहा कि लेह, लद्दाख से लेकर करगिल और सियाचिन तक, यहां की बर्फीली चोटियों से लेकर गलवां घाटी की ठंडे पानी की धारा तक। हर चोटी, हर पहाड़, हर जर्रा-जर्रा, हर कंकड़, पत्थर भारतीय सैनिकों के पराक्रम की गवाही दे रहा है।

प्रधानमंत्री और सेना प्रमुखों का दौरा चीन के लिए एक सबक था कि भारत किसी भी परिस्थिति में पीछे नहीं हटेगा और उसकी किसी भी चाल का मुंहतोड़ जवाब देगा। इसी के साथ विदेश मंत्री एस जयशंकर भी लगातार सीमा विवाद को लेकर रूस और अमेरिका के साथ चर्चा करते रहे। 

इसमें अमेरिका ने भारत के प्रति समर्थन जताया। इसके साथ ही रूस ने भी आश्वासन दिया था कि वह इस मुद्दे पर भारत के साथ खड़ा है।

(2) अंतरराष्ट्रीय दबाव
कोरोना वायरस को लेकर चीन पर वैश्विक बिरादरी पहले से ही नाराज थी, ऊपर से भारत के साथ तनाव ने वैश्विक बिरादरी को चीन के खिलाफ एकजुट कर दिया। 

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो लगातार भारत का समर्थन करते हुए सीमा विवाद को लेकर चीन पर हमला बोलते रहे। इसके अलावा वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को निशाने पर लेते हुए कह चुके थे कि ये दुनिया के लिए खतरा है।

इसके अलावा अमेरिका ने चीन को चुनौती देते हुए यूरोप से अपने सैनिकों को कम करके एशिया में तैनात किया, इससे भी चीन पर दबाव बढ़ा। अमेरिका के विदेश मंत्री ने चीन को खतरा बताते हुए कहा, कुछ जगहों पर अमेरिकी संसाधन कम होंगे, क्योंकि उनकी तैनाती उन जगहों पर होगी जहां चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी आक्रामक सैन्य कार्रवाई को बढ़ा दिया है। हम अपनी सेना को भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया, दक्षिण चीन सागर के उन जगहों पर तैनात करने जा रहे हैं, जहां चीन की सेना से सबसे ज्यादा खतरा है।

(3) गलवां नदी का बढ़ता जलस्तर
चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने पूर्वी लद्दाख की गलवां घाटी में गतिरोध के प्वाइंट पर पांच किलोमीटर की दूरी पर बड़ी संख्या में सैनिकों को एकत्र किया हुआ था।

लेकिन बर्फ पिघलने की वजह से गलवां नदी का जलस्तर बढ़ने लगा, जिस कारण चीनी सैनिकों को पीछे हटने पर मजबूर होना पड़ा। एक वरिष्ठ सैन्य कमांडर ने बताया कि उपग्रह और ड्रोन तस्वीरों से पता चलता है कि नदी किनारे स्थित चीनी टेंट बाढ़ की वजह से डूब सकते हैं।