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इको फ्रेंडली दिवाली मनाएं, पर्यावरण को बचाएं: डॉ अशोक कुमार अग्रवाल
November 12, 2020 • Dr. SANDEEP BHARDWAJ • ज्ञानवर्धक जानकारी

संजीव शर्मा,एन टी न्यूज़:  दीपावली भारतीयों का का प्रमुख त्यौहार है और इस दिन बड़ी मात्रा में आतिशबाजी भी की जाती है। भारत के इस धार्मिक प्रकाशोत्सव पर आज के समय की मांग को ध्यान मे रखते हुये राजकीय महाविद्यालय चिन्यालीसौड़ उत्तरकाशी, उत्तराखंड के असिस्टेंट प्रोफेसर वनस्पति विज्ञान एवं पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ अशोक कुमार अग्रवाल ने पटाखो में प्रयुक्त रसायनों से उत्पन्न दुष्प्रभावों पर विस्तार से प्रकाश डाला है।

डॉ अशोक कुमार अग्रवाल ने बताया कि भले ही पटाखे आकर्षक रंग और कलाकृतियां उत्पन्न करते हैं पर यह कई प्रकार के रसायनों का मिश्रण होते हैं जिनके जलने के कारण कई प्रकार के प्रदूषण उत्पन्न होते हैं।पटाखों में मुख्यता सल्फर के तत्व मौजूद होते हैं लेकिन इसके अलावा और भी कई प्रकार के बाइंडर्स ,स्टेबलाइजर ,ऑक्सिडाइजर ,रिड्यूजिंग एजेंट और रंग मौजूद होते हैं जो की रंग बिरंगी रोशनी पैदा करते हैं एंटीमोनि सल्फाइड , बोरियम नाइट्रेट, एलमुनियम ,तांबा ,लिथियम और स्ट्रांसियम के मिश्रण से बने होते हैं ,जब यह पटाखे जलाए जाते हैं तो इनमें से कई प्रकार के रसायन हवा के साथ मिल जाते हैं और हवा की गुणवत्ता को काफी हद तक हानि पहुंचाते हैं चूंकि दिवाली का त्यौहार अक्टूबर या नवंबर में आता है जिस समय भारत के ज्यादातर शहरों में ठंड व कोहरे का मौसम रहता है और यह पटाखों से निकलने वाले धुयें के साथ मिलकर प्रदूषण के स्तर को और भी ज्यादा बढ़ा देते हैं।

दिवाली की रात होने वाली आतिशबाजी के कारण वायु की गुणवत्ता काफी नीचे स्तर पर पहुंच जाती है बड़ों की अपेक्षा बच्चे इसके हानिकारक प्रभावों द्वारा सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं लेकिन पटाखों से निकलने वाले रसायन सभी के लिए हानिकारक होते हैं और अल्जमायर तथा फेफड़ों के कैंसर, त्वचा, ब्रोंकाइटिस, आँखो मै जलन तथा स्वसन संबंधी गंभीर बीमारियों दमा आदि का कारण बन सकते हैं। पटाखों की धूम धड़ाम हमारे कानों को भी  क्षतिग्रस्त करने और ध्वनि प्रदूषण को बढ़ाने का कार्य करती है ।  मनुष्य के कान 5 डेसीबल की आवाज को बिना किसी नुकसान के सह सकते हैं लेकिन पटाखों की औसत ध्वनि स्तर लगभग 125 डेसिबल होती है जिस कारण लोगों में कानों में  सुनने की समस्या आ जाती है।  

प्रकाश पर्व दिवाली पर पटाखों ने निश्चित रूप से हमारे लिए चीजों को अंधकारमय कर दिया है, प्रदूषण इस स्तर तक पहुंच गया है कि हाल में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने दिवाली पर कई शहरों में  पटाखों का उपयोग करने पर प्रतिबंध जारी किया है इसी क्रम में माननीय राष्ट्रीय हरित अधिकरण द्वारा भी वायु प्रदूषण एवं कोविड-19 के दृष्टिगत पटाखों के बेचने व जलाने के संबंध में भी दिशा निर्देश जारी किए गए हैं इसी क्रम में उत्तराखंड के पर्यावरण संरक्षण पर जलवायु परिवर्तन विभाग ने उत्तराखंड के कई शहरों में केवल ग्रीन क्रैकर्स की ही बिक्री की अनुमति प्रदान की है साथ ही पटाखे जलाने की समय सीमा रात्रि 8:00 बजे से 10:00 बजे तक निश्चित की है।

पटाखों से पर्यावरण के साथ-साथ स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। डॉ अशोक कुमार अग्रवाल ने कहा कि पर्यावरण प्रेमी होने के कारण उनका मानना है कि हमें अपने स्वास्थ्य के साथ-साथ अपने बच्चों के स्वास्थ्य और पर्यावरण पर इनके होने वाले दुष्प्रभाव के विषय में सोचना होगा तथा इनके उपयोग को कम करने के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे। हमें संकल्प लेना होगा कि इस दिवाली प्रतीकात्मक रूप से पटाखों का उपयोग करें या फिर ग्रीन पटाखे जलाकर प्रदूषण ना के बराबर करें और इको फ्रेंडली दिवाली मनाएं ।