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भारतीय सैटेलाइट एस्ट्रोसैट, नासा के हबल से आगे ??
August 25, 2020 • Dr. SANDEEP BHARDWAJ
  • भारतीय सैटेलाइट एस्ट्रोसैट ने पकड़े वे संकेत जो नासा का हबल  भी न पकड़ पाया

अंतरिक्ष में दुनिया भर के उन्नत टेलीस्कोप और अंतरिक्षयान अब बहुत दूर के पिंडों की जानकारी हासिल करने लगे हैं।  ऐसे में भारत भी पीछे नहीं हैं। भारत के एस्ट्रोसैट (AstroSat) नाम के पहले मल्टी तरंगीय सैटेलाइट (Multi wavelength Satellite) ने पृथ्वी से 9.3 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित गैलेक्सी से आती हुई पराबैंगनी किरणों को पकड़ा है,जबकि इस अध्ययन में दुनिया भर के वैज्ञानिक शामिल थे।

भारत में पुणे स्थित इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स (IUCAA) ने सोमवार को जानकारी देते हुये बताया कि भारत के एस्ट्रोसैट (AstroSat) नाम के पहले मल्टी तरंगीय सैटेलाइट (Multi wavelength Satellite) ने पृथ्वी से 9.3 अरब प्रकाश वर्ष दूर स्थित गैलेक्सी से आती हुई पराबैंगनी किरणों को रिकार्ड किया है। यूनिवर्सिटी की ओर से जारी बयान में कहा गया कि  कि IUCAA वैज्ञानिकों की एक वैश्विक टीम यह बड़ी खोज करने में सफल हुई है जिसमें उन्होंने भारतीय उपग्रह एस्ट्रोसैट की मदद ली।
उन्होने बताया कि एस्ट्रोसैट नाम का भारत का पहला मल्टी वेवलेंथ सैटेलाइट जिसमें पांच खास तरह के एक्स रे और अल्ट्रावायलेट टेलीस्कोप एक साथ काम करते हैं, ने 9.3 अरब प्रकाशवर्ष दूर स्थित AUDFs01 नाम के गैलेक्सी से पराबैंगनी किरणों को रिकार्ड किया है।

इस खोज के लिए लगी अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों टीम का नेतृत्व डॉ कनक साहा कर रहे थे जो IUCAA में एस्ट्रोनॉमी के एसोसिएट प्रोफेसर हैं। प्रेस-रीलिज के मुताबिक यह अध्ययन नेचर एस्ट्रोनॉमी में प्रकाशित हुआ है। इस टीम में भारत के अलावा अमेरिका, फ्रांस, नीदरलैंड, स्विटडरलैंड और जापान के वैज्ञानिक शामिल थे।
इस टीम ने एस्ट्रोसैट से हबल एक्सट्रीम डीप फील्ड में स्थित गैलेक्सी का अवलोकन किया। ये अवलोकन अक्टूबर 2016 में 28 घटों से कुछ ज्यादा समय के लिए किए गए थे। लेकिन इन आंकड़ों का बारीकी से अध्ययन करने में लगभग दो साल का समय लग गया। इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि ये पराबैंगनी विकिरण पृथ्वी पर आने से पहले ही ओजोन परत द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है, इसी लिए इस शोध के लिए अंतरिक्ष में स्थित टेलीस्कोप की मदद लेनी पड़ी।
नासा का हबल स्पेस टेलीस्कोप (HST) भी इन पराबैंगनी विकरण को पकड़ नहीं पाया था,जो कि एक अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (UVIT) से भी बड़ा टेलीस्कोप है। इस पराबैंगनी किरणों की ऊर्जा 13.6 eV से भी ज्यादा ऊर्जा थी। लेकिन दूरी की वजह से यह एक बहुत ही धुंधली दिखाई दी।
एस्ट्रोसैट या UVIT इन विकरणों को पकड़ने में सफल हो सका क्योंकि UVITडिटेक्टर की पृष्ठभूमि की आवाज हबल टेलीस्कोप की पृष्ठभूमि की आवाज से काफी कम थी।
IUCAA के निदेशक डॉ सैमिक राय चौधरी ने इस खोज की अहमियत बताते हुए कहा, “यह इस बारे में एक बहुत अहम संकेत है कि कैसे ब्रह्माण्ड में काला युग समाप्त हुआ था और ब्रह्माण्ड में प्रकाश फैला था। हमें यह जानने की जरूरत थी कि ऐसा ब्रह्माण्ड में कब हुआ, लेकिन प्रकाश के शुरुआती स्रोत के बारे में जानना बहुत ही मुश्किल है।  मुझे फक्र है कि मेरे साथी इस अहम खोज कर सके।”

अंतरिक्ष में दुनिया भर के उन्नत टेलीस्कोप और अंतरिक्षयान अब बहुत दूर के पिंडों की जानकारी हासिल करने लगे हैं।  ऐसे में भारत भी पीछे नहीं हैं। भारत के एस्ट्रोसैट (AstroSat) नाम के